बुधवार, 16 मई 2012

आखिर इस्लाम और मुसलमान भारत से क्या चाहता है ----?

        हम भारतीयों को ७१२ इशवी सन ध्यान में रखने की आवश्यकता है लेकिन हम हिन्दू कैसे है कि सब कुछ भूल जाते है ऐसा नहीं था कि मुहम्मद बिन कासिम केवल लुटेरा ही था नहीं वह लूट के साथ धर्म परिवर्तन करता था भारतीय जनमानस इन सारी बातो को समझ नहीं पाता लेकिन जब  समझने लगा तो लुटेरे जब वापस जाते तो हमारे महापुरुषों ने धर्मान्तरित लोगो कि पुनः वापसी कर उन्हें राष्ट्र कि मुख्य धारा में जोड़ लेते उसी समय देवल ऋषि  ने घर वापसी हेतु देवलस्मृति लिखा, मै केवल मुहम्मद बिनकासिम की बात नहीं कारता बल्कि इस्लाम के नाम पर चाहे महमूद गजनवी हो या बख्तियार खिलजी अथवा चंगेज खा या कोई बाबर और उनकी संताने सभी ने इस्लाम के नाम पर भारतीयों को केवल लूटा ही नहीं बलात धर्म परिवर्तन कराया हमारी माँ -बहन- बेटियों के साथ घिनौना कृत्य किया, हमारे ही यहाँ हमारी बहन बेटियों को मीना बाज़ार में बेचा जाने लगा तब भी हम मुसलमान और इस्लाम को समझा नहीं पा रहे है तो आखिर हम कब इन राक्षसों को जानेगे  कही गाड़ी छूट न जाय.
        इस्लाम के नाम पर सब जायज है कितना ही घृणित कृत्य किया जाय किसी कि बहन बेटी को प्रेम जाल में फसाकर उसे वैश्या बनाना इस्लाम की सेवा है, उसे आतंकबादी गतिबिधियो में सामिल करना इस्लाम की सबसे बड़ी सेवा है,  किसी भी के साथ ब्याभिचार करना भी इस्लाम की सेवा है, हिन्दुओ के मंदिरों को तोडना, धर्म ग्रंथो को जलाना और शंख, घंटा, घरियारी बजाने से रोकना इससे अधिक तो इस्लाम की सेवा और कोई हो ही नहीं सकती, आइये हम बंगलादेश जिसको हमने अपने खून से आजाद कराया लगभग हमारी कृपा पर ही है को ही देखे, अयोध्या बिबादित ढाचा टूटने के पश्चात् एक लाख मंदिर तोड़ डाले इतना ही नहीं वह की सियासी पार्टियों ने लाखो एकड़ जमीं हिन्दुओ की कब्ज़ा कर लिया सरे आम हिन्दुओ की बहन बेटियों को उठा ले जाना बलात्कार करना तो आम बात हो गयी है मुसलमान कितना राक्षसी हो गया की बलात्कार करते-करते जब थक जाता है तो बॉस को पोंगल हिन्दु महिलाओ के गुप्तांग में डालकर अट्टहास करता है और कई महिलाये मर जाती है कोई भी दस वर्ष की हिन्दू बालिका नहीं बची है जिसके साथ बलात्कार नहीं हुआ है [टुटा मठ, बंगलादेश में हिन्दू नरसंहार, आधीरात की संताने 'सलाम आजाद' ]. पाकिस्तान की हालत तो और भी बदतर है जबरदस्ती हिन्दु लडकियों को इस्लाम काबुल करवाना और जबरदस्ती शादी करना आम बात है आये दिन अखबारों का समाचार बना हुआ है कोई पूछने वाला नहीं है, भारतीय संसद चुप है सेकुलर के नाम पर देश द्रोह करना आदत सी हो गयी है, अपने ही देश कश्मीर में हिन्दू समाप्त कर दिया गया एक भी कश्मीरी पंडित श्रीनगर जो मंदिरों का शहर के नाते जाना जाता था आज एक भी मंदिर नहीं है जहा सेना की छावनी वही मंदिर है, घाटी भी सेना के सहारे ही भारत में है जिस दिन सेना हटा ली जाय कश्मीर घाटी हमारे पास नहीं रहेगी, यदि थोड़े में इस्लाम को समझना हो तो इतना ही पर्याप्त है.
         आखिर भारत कब समझेगा इस्लाम को, १२०० वर्ष तो हो गया कुरान और इस्लाम के अनुयायियों के अत्याचार को सहते, देखते, और पढ़ते, हमारी सहने की सीमा क्या होगी --? हमारी यादास्त इतनी कमजोर हो गयी है --? हमने तो सबसे पहले अफगानिस्तान --------इस्लाम के नाम पर गवाया, फिर १५ अगस्त १९४७ को पाकिस्तान और बंगला देश दिया, आज भी बंगला देश घुसपैठियों की संख्या ३ करोण हो गयी है जो पाकिस्तान से मुसलमान आता है वह जाता ही नहीं, दूसरी तरफ हिन्दू आता है तो उसे कोई पूछने वाला नहीं उसे नागरिकता नहीं दी जा रही प्रशासन उसे परेशान करता है इस माध्यम से हमारी माग है की जो भी हिन्दू कही से भागकर आता है उसे भारत में नागरिकता दी जाय, हम भारत के दूसरे बिभाजन के मोड़ पर खड़े है, जब भारत का बिभाजन हुआ था उस समय पाकिस्तान में हिन्दुओ की संख्या एक करोड़ थी, बंगलादेश में हिन्दू दो करोण था, और भारत में मुसलमान ढाई करोण था, इस समय पाकिस्तान में हिन्दू संख्या केवल ३० लाख बचा हुआ है, बंगलादेश में हिन्दू की संख्या केवल अस्सी लाख है आखिर ये सब हिन्दू कहा चले गये या तो मार दिए गए या धर्मान्तरण कर मुसलमान बना लिए गए, दूसरी तरफ भारत में मुसलमानों की संख्या दिन-दुनी रात चौगुनी बढ़कर १४ करोण कहा से हो गयी, जब कि सेकुलर नेता सब चिल्लाते रहते है की अल्पसंख्यको को सताया जा रहा है.
         आज अपने ही घर में हिन्दू बेघर जैसा लग रहा है जगह -जगह इस्लाम के नाम पर दुर्गा पूजा नहीं हो पा रही है, सरस्वती जी की मूर्तियों पर हमला हो रहा है, लव जेहाद कर हिन्दुओ की एक लाख लडकियों को भागकर मुसलमान इस्लाम की सेवा कर रहा है, मुस्लिम मुहल्लों में शंख, घंटा घरियार बजाना बंद हो गया है, हिन्दू अपने ही घर में गुलामी का जीवन ब्यतीत करने को मजबूर हो रहा है आखिर ये सब कब-तक ?
        मुसलमानों तुम्हे हिन्दुओ से क्या चाहिए तुमने तो हमारे देश का बिभाजन कराकर हमारी जमीन ले लिया इतना ही नहीं हजारो -लाखो मंदिरों को तोडा ही नहीं धर्म- ग्रंथो भी जलाया लेकिन तुमने भारत में रहकर फिर देश का बिभाजन फिर वही ४७ का हाल हम कबतक सहते रहेगे, इन सेकुलर नेताओ के झासे में आते रहेगे कही ऐसा न ही की हिन्दू समाज खड़ा हो जाय और तुम्हारा आतंकबाद तुम्हारे घर में ही समाप्त करना शुरू कर दे, तुम्हे राणा याद नहीं आते, तुम शिवा जी को भूल गए, तुमने वीरबंदा को देखा नहीं, तुम्हारी दृष्टि हरीसिंह नलवा को क्यों नहीं देखती ? क्या तुमने गुरुगोबिंद को नहीं जाना ? क्या तुम्हे याद नहीं कि ७१ के युद्ध में हमारी हिन्दू सेना ने पाकिस्तानी सेना के ९५ हज़ार सैनिको को बंदी बनाया था, तुम याद रखो भारत में तुम हिन्दुओ की कृपा पर ही रह सकोगे तुम्हे तय करना होगा हिन्दू के साथ मिलकर रहोगे या नहीं, वैसे तुम्हारी निति और इस्लाम तो भारत और हिन्दुओ के खिलाफ है और तुम किसी के साथ नहीं रह सकते तुम्हे जाना ही होगा, लेकिन यह भी तय है की आगामी दस वर्षो में इस संसार से इस्लाम नाम का धर्म समाप्त हो जाएगा क्यों कि इस प्रकार मानवता बिरोधी इस धरती को बर्दास्त नहीं तुम अपने को देख नहीं रहे हो तुम तो अमेरिका के या तो गुलाम हो या उसके द्वारा मारे जा रहे हो लेकिन तुम्हारी करनी ही ऐसी है इस्लाम केवल आतंकबाद का पर्याय बनकर रह गया है, अब इस्लाम इतिहास में आतंकियों के नाते ही याद किया जायेगा, इसलिए तुम्हे विश्व से समाप्त होना ही है यही संसार प्रकृति की नियति है.        

सोमवार, 7 मई 2012

महात्मा बुद्ध और भारत ---------बुद्ध पूर्णिमा [५ अप्रैल ] पर विशेष.

         कोई ३१०० वर्ष पूर्व अहिंसा और आत्म ज्ञान के लिए जिस धर्म का उदय हुआ वह भारतीय बंगमय और वेदों के बिरुद्ध होने के कारन केवल ३२५ वर्ष में ही भारत भूमि से समाप्त हो गया, इस धर्म की कायरता जहा विदेशी हमलावरों को रोक नहीं सका, वही दूसरी तरफ साकेत तक घुसी हुई विदेशी विदेशी यवन सेनाओ को हराता हुआ सेनापति पुष्य मित्र जब पाटलीपुत्र लौटा तो देखा कि वहा राजा तो अहिंसा के नाम पर यवनों के आगे समर्पण कर चुका है, तब भारत की मर्यादा बचाने के लिए पुष्य मित्र ने राजा बुद्धगुप्त को मारकर पाटलीपुत्र की गद्दी पर बैठा.
      कपिलवस्तु के राजा सुद्दोधन के यहाँ एक पुत्र पैदा हुआ राजमहल में प्रशन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहा राजा ने पुरिहित को बुला भेजा पुरोहित ने बिचार करने पश्चात् राजा को बताया की यह बालक या तो बहुत बड़ा राजा होगा या बहुत बड़ा सन्यासी होगा इसका नाम सिद्धार्थ होगा, राजा सुदोधन को लगा की यदि हमारा पुत्र पढ़ लिख गया तो अवस्य ही सन्यासी हो जायेगा, इस नाते योजना बद्ध उनके पढने की ब्यवस्था नहीं की गयी इस कारन राजकुमार सिद्धार्थ पढ़े-लिखे नहीं थे, राजकुमार सिद्धार्थ का विबाह बचपन में ही एक बहुत सुन्दर राजकुमारी से कराया गया,  उनके भोग-बिलास [सूरा -सुंदरी ]की ब्यवस्था राजमहल में ही कर दी गयी, इतिहास बताता है कि जिस दिन वे घर छोड़े उस रात वे बहुत सी सुन्दरियों के साथ सोये थे .
          एक दिन वे राजमहल से बहार अपने मंत्री के साथ निकले तो रास्ता रुका हुआ था उन्होंने मंत्री से पूछा की ये क्या है उसने बताया की ये मारा हुआ मनुष्य है ये ऐसा क्यों है उसने बताया की एक दिन सबको जाना ही पड़ता है , आगे उन्होंने देखा की एक ब्यक्ति डंडा लेकर ठेगते जा रहा है सिद्धार्थ के पूछने परा बताया की एक दिन सभी मनुष्य इस अवस्था में आते है उसी दिन उन्होंने तय किया की मै इसका खोज करुगा और वह अर्ध रात्रि के समय सन्यास के लिए चल दिए .
        ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उन्होंने सारनाथ में चार भिक्षुओ को उपदेश दिया और अपने घर की तरफ चल दिए उन्होंने सर्व प्रथम अपने पुत्र और परिवार के लोगो को दीक्षा दी वे सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध हो चुके थे उनकी ख्याति भारत में चारी तरफ फ़ैल चुकी थी उस समय हिंसा चार बढ़ गया था महात्मा बुद्ध ने हिंसा के बिरुद्ध शिक्षा दी वे अहिंसा बड़ी थे ऐसा नहीं था की वे अहिंसा का प्रथम उपदेश दे रहे थे भारत में तो अहिंसा को पहले ही वेदों में विस्तार से बताया गया है, लेकिन कर्म -कांड में इसका गलत तरीके से उपयोग किया गया और कहा गया की ये सब वेदोक्ति है महात्मा बुद्ध ने कहा की यदि ये कर्म -कांड हिंसाचार वेदों में है तो मै वेद ही नहीं मानता जब पुरिहितो ने ये कहा की ये सब भगवान को चढ़ाया जाता है तो भगवान बुद्ध ने कहा कि मै ऐसे किसी भगवान को नहीं मानता जो हिंसा करवाता हो, इस नाते बुद्ध का दर्शन न तो वैदिक रहा न ही इश्वर को मानने वाला बुद्ध दर्शन नास्तिक दर्शन हो गया, ये उनका दोस नहीं था ये तो सनातन परंपरा मानने वाले लोगो, पंडितो और उनके पिता श्री जिन्होंने उन्हें पढाया नहीं वे वेद नहीं पढ़े थे उन्हें उपनिषदों का ज्ञान नहीं था उन्होंने गीता देखी नहीं थी इस नाते वे मनुष्य की दुखी अवस्था से दुखी होकर उन्हीने यह मार्ग अपनाया, बौद्ध ने कभी राजसत्ता नहीं छोड़ी यह एक प्रकार शासक ही थे और बौद्ध धर्म के द्वारा ही सत्ता चलाना चाहते थे इसी कारन यह धर्म लम्बे समय तक भारतीय वैदिक भूमि पर चल नहीं सका.
        उनका ज्ञान बहुत उचा था नास्तिक होने के कारन भारतीय बांगमय अथवा वेद बिरुद्ध हो गया इतना ही नहीं यह धर्म सद्गुण बिकृति का शिकार हो गया, इस कारन भारत कि जितनी हानी बुद्ध धर्म या उनके बिचारो से हुआ उतना किसी परकीय धर्म ने नहीं किया न तो इसाईयों द्वारा न ही मुसलमानों द्वारा,  बुद्ध की शिक्षा का असर इतना हुआ कि वैदिक गुरुकुलो को बुद्ध गुरुकुलो में परिवर्तित किया जाने लगा क्यों कि बुद्ध ऐसे संत थे जो क्षत्रिय राजबंश से आते थे  इस कारन भारतीय राजाओ को लगा कि यह तो अपने ही कुल गोत्र का है बिना जनता कि राय या मत लिए ही उद्घोषणा कर दिया गया कि सभी हिन्दू धर्म छोड़कर बुद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया लेकिन ऐसा नहीं था वैदिक धर्म में ऐसा नहीं होता कि जो राजा का धर्म हो वही जनता माने लेकिन जोर जबरदस्ती जनता पर थोपा हुआ धर्म, बौद्ध धर्म था  परिणाम यह हुआ कि भारत में इस धर्म ने कारयता और आलसी लोगो को पैदा किया जो कर्म हीन हो गए बुद्ध ने अहिंसा पर जोर दिया लेकिन कोई भी बुद्ध धर्म मानाने वाला साकाहारी न होकर सभी मांसाहारी होते है यहाँ तक इनके सबसे ताकतवर धर्माचार्य दलाईलामा घोर मांसाहारी है बौद्धों कि कथनी और करनी में जमीन- असमान का अंतर है सभी गो मांस भक्षक है, भारत जो अरब, अफगानिस्तान, ईरान, इराक तक था वे सभी पूरा भारत बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया क्यों कि यह धर्म प्रतिक्रिया बादी था इस कारन हिंदुत्व के बिरोध में था परिणाम स्वरूप सारा का सारा यह क्षेत्र इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया इतना ही नहीं पश्चिम के आक्रमण कारियों का साथ देकर भारत का बिरोध करना ही अपना कर्तब्य समझा फिर क्या था इस्लाम कि ताकत बढती गयी और ऐसी घटनाये होनी शुरू हो गयी कि जिस नालंदा गुरुकुल में दस हज़ार क्षत्र पढ़ते हो, हजारो आचार्य हो वहा लुटेरा आक्रमण कारी बख्तियार खिलजी १८ घुड़- सवारों के साथ आता है और गुरुकुल का पुस्तकालय जलाता कर चला जाता है इस बौद्ध धर्म या गौतम बुद्ध का शंदेश यदि देश में नपुंसकता को पैदा करता है तो यह भारत के लिए कितना खरतनाक सिद्ध हुआ हम समझ सकते है.
          इस बिचार के नाते भारत की सीमाए केवल सिकुड़ी ही नहीं, मै विहार की याद दिलाता हु बिहार का नाम कभी बिहार नहीं था बुद्ध का प्रभाव क्षेत्र होने के कारन यहाँ बौद्ध विहार बहुत थे ये सारे के सारे बौद्ध -विहार मस्जिदों में परिणित हो गाहे और सारे बौद्ध इस्लाम मतावलंबी हो गए जो आज बर्तमान बिहार के लिए हिन्दुओ के लिए जीना दूभर किये हुए है इतना ही नहीं बिहार तो इस समय आतंकबाद की नर्शरी का रूप धारण कर चुका है हमें खुले मन से बिचार करने की आवश्यकता है की नालंदा गुरुकुल को नया वि.बि. बनाने की तयारी चल रही है क्या हम वैसा ही गुरुकुल चाहते है जिसमे १८ घुड़सवार आये और उसे समाप्त कर चले जाय नालंदा का नाम उस समय बड़ा था जब वह गुरुकुल वैदिक गुरुकुल था जिसमे सम्पूर्ण विश्व के विद्यार्थी पढने के लिए आते थे जिसमे बिन्दुसार जैसा वीर शक्तिशाली राजा को जन्म देता था, आज भी यह प्रतिक्रिया बाद में है बोध गया में आदि शंकराचार्य के मंदिर के सामने ये जूता रखने का स्थान बनाये हुए है इतना ही नहीं दोध गया के बौद्ध मंदिर में प्रवेश द्वार पर भगवन विष्णु का विग्रह बना हुआ है बौध के हाथ में शिवलिंग रखा हुआ है वहा महाराष्ट्रियन नवबौद्ध प्रतिदिन वहा आन्दोलन करते है की विष्णु और शंकर की मूर्ति हटाई जाय, यदि वहा का हिन्दू खड़ा हो जाय कि शंकराचार्य के मंदिर का जीर्णोद्धार किया जायेगा और वहा से बौद्ध मंदिर के विकाश को रोका जाय तो क्या होगा ----? यह भी हमें सोचना चाहिए, हमें बिचार करने की आवस्यकता है की हिन्दू के अतिरिक्त कोई भी विचार उदारबादी नहीं है बौद्ध विचार भी इस्लाम और इशाई के सामान ही है ये अपनी सर्बोच्च सत्ता चाहते है, हमने ब्यवहारिक दृष्टि से यह लिखा है, हमें उसी प्रकार मूल्याकन करने कि जरुरत है जैसे कुरान के प्रेम मोहब्बत का धर्म बताकर सम्पूर्ण विश्व में आतंक फैला रखा है उसी प्रकार बौद्ध दर्शन को केवल पढना ही नहीं भारत ने जो भोगा  है उसे भी यथार्थ रूप से देखना पड़ेगा.

बृहस्पतिवार, 3 मई 2012

वैदिक धर्म यानी हिन्दू धर्म के पुनरुद्धारक थे कुमारिल भट्ट

          जब पूरा भारत बौद्धों की चपेट यानि बौद्धप्राय हो गया था, लगभग नास्तिक धर्म राष्ट्राबाद से अलग -थलग होता भारतदेश, विदेशी आक्रमंकरियो के लिए चारागाह होता देश, बौद्ध धर्म राजा और  महराजाओ का धर्म, जनता की बिना इक्षा के थोपा हुआ धर्म, जो भारतीयता से कोई मेल नहीं खाता जिसमे  राष्ट्रबाद को कोई स्थान नहीं, ऐसे में किसी भी देश भक्त का चिंतित होना स्वाभाविक है काशी में एक बौद्ध राजा की महारानी अपने घर के छत पर खड़ी होकर वैदिक धर्म की दुर्दशा पर रो रही थी किससे कहे अपने मन की ब्यथा को वादिक अथवा सनातन धर्म का नाम लेना तो अपराध हो गया था, गली से जाता हुआ गुरुकुल के एक ब्रम्हचारी के सिर पर पानी की कुछ बूद पड़ी ब्रम्हचारी को लगा की बिना वर्षा के ये पानी ऊपर देखा तो एक माता रो रही है, माता क्या कष्ट है ? उस रानी के मुख से निकल गया कौन बचाएगा इस वैदिक धर्म को --? मै वेदों का उद्धार करुगा, मै पुनर्स्थापना करुगा अपने सनातन धर्म का, यह आश्वासन देना आचार्य कुमारिलभट्ट का ही साहस था.
         कुमारिलभट्ट जन्म के बारे में कई मत है कुछ लोग उन्हें दक्षिण भारत का मानते है जबकि उत्तर के लोग मिथिला को उनकी जन्म भूमि मानते है इतना तो सही है २८०० वर्ष पूर्व शंकराचार्य के समकालीन यानी उनसे लगभग उम्र में कुछ बड़े थे, उनके मुख्य शिष्य मंडन मिश्र की शिक्षा -दीक्षा कुमारिल द्वारा स्थापित गुरुकुल गौड़ राजधानी मंडला में हुई, वे पहले आचार्य है जिन्होंने जैन अथवा बौद्ध धर्म का खंडन कर वैदिक धर्म की श्रेष्ठता को सिद्ध किया, कुमारिल भट्ट माँ नर्मदा उद्गम स्थल अमरकंटक जो गोविन्द्पाद [शंकराचार्य के गुरु] के गुरु गौडपाद की तपस्थली पहुचे उन्होंने गौडपाद [वेदब्यास के अवतार] से कई शंकाए ब्यक्त की 'एकं सद बिप्रा बहुधा बदंति' इसका निवारण करते हुए गौड़ पाद  ने उन्हें बताया की जिनका विस्वास वेदों पर है, जो भारतीय वांगमय को मानते है, ये उन्ही के लिए है न कि अन्य या परकियो के लिए दूसरा उन्होंने कहा पुत्र खंडन नहीं मंडन करो, तीसरा उन्होंने वैदिक कर्मकांड पर जोर दिया. उन्ही की बात को ध्यान में रखकर अपने प्रिय शिष्य विश्वरूप का नाम मंडन मिश्र रखा, आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने जो दिग्विजय यात्रा शुरू की उसकी पूर्व भूमिका अथवा वातावरण कुमारिल भट्ट ने पहले ही तैयार किया था, यह अतिशयोक्ति नहीं होगा की कुमारिल की तर्क बुद्धि के आधार पर ही शंकराचार्य को दिग्विजय प्राप्त हुई .
           कुमारिल को वेदाध्ययन तो था ही लेकिन बौद्ध मत के खंडन हेतु मगध के नाल्लंदा बौद्ध गुरुकुल में अध्ययन करना पड़ा प्रति दिन धर्मपाल द्वारा प्रवचन में वेदों की आलोचना होती कुमारिल इस आलोचना को कितना बर्दास्त करते एक दिन सभा में कुमारिल के आखो से आसू बहने लगा धर्मपाल [कुलपति] ने कहा कुमारिल तुम्हारा स्वस्थ ठीक नहीं है तुम विश्राम करो, नहीं आचार्य मेरा स्वस्थ ठीक है पुनः वेदों की आलोचना पर उनके आखो में आसू देखकर धर्मपाल  ने दुबारा टोका वे फिर वही बैठे रहे जब तीसरी बार वेदों की आलोचना होने लगी तो कुमारिल के आसू देख धर्मपाल ने डाटा की तुम्हारी तबियत ठीक नहीं तुम कमरे में क्यों नहीं जाते---? नहीं आचार्य स्वास्थ तो आपका नहीं ठीक है मै तो ठीक हु बिना वेदों के अध्ययन के वेदों की आलोचना कर रहे है आप जैसे विद्वान के लिए यह शोभा नहीं देता, फिर क्या था गुरुकुल के आचार्यो को लगा ये तो बौद्ध धर्म को स्वीकार नहीं किया ये सनातन हिन्दू धर्म को ही मानता है जिनका सिद्धांत कहता है अहिंसा परमो धर्मः, उन्होंने कुमारिल को सजा सुनाई की इसको दुमंजिले से सिर के बल फेक दिया जाय. कुमारिल भट्ट ने कहा की मुझे एक मौका चाहिए, वे पद्म आसन में बैठे और आवाहन किया यदि वेद सत्य है तो मुझे कुछ नहीं होगा, उन्हें सिर के बल फेका गया वे पैदल चलते चले गए उनकी विजय पताका पूरे मिथला फिर देश देशांतर में फैलने लगी.
           कहते है की वे पूर्वमीमांशा के प्रथम आचार्य है आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने जो वैदिक धर्म की विजय पताका पूरे देश में फहरायी उसकी पूरी भूमिका कुमारिल भट्ट ने पहले ही तैयार कर दीथी आचार्य की विद्वता के लिए उनके शिष्य मंडन मिश्र का ही परिचय ही पर्याप्त है आदि शंकर उनसे शास्त्रार्थ के लिए पधारे तो वे प्रयाग में संगम पर तुषानल [चावल की भूसी] में जल रहे थे शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ के लिए आवाहन किया तो उनकी यह दशा देखकर अपनी अंजुली में पानी लेकर मै अभी तुषानल को शांति करता हु, नहीं आचार्य मुझे पता था आप आने वाले है, यह कार्य मेरा शिष्य मंडन करेगा मैने गुरु द्रोह किया है मैंने यह स्वयं ही स्वीकार किया है, शंकराचार्य उन्हें हमेशा गुरु स्थान पर रखते थे उनका मत मीमांसामें गुरुमत कहा जाता है, पूर्वमीमांसा दर्शन के शावर भाष्य पर उनकी टीका है, इनका दूसरा ग्रन्थ 'श्लोक-वार्तिक' है, वे जैन अथवा बौद्ध मतों को खंडन करने वाले प्रथम आचार्य है उन्होंने वेदों की सार्थकता, वेद अपौरुषेय है यह अपने तर्कों द्वारा सिद्ध किया, जिन्हें हमेशा भारत वर्ष और हिन्दू धर्म कृतज्ञता अर्पित करता रहेगा. 

रविवार, 29 अप्रैल 2012

हरीसिंह नलवा ने मारे खेद-खेद अफगान पठान ---२८ अप्रैल नलवा के जन्मदिन पर-------.

               हरीसिंह नलवा महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति थे उनका जन्म १७९१ में २८ अप्रैल को एक सिख परिवार, गूजरवाला- पंजाब में हुआ था इनके पिता का नाम गुरदयाल सिंह माँ का नाम धर्मा कौर था, बचपन में उन्हें घर पर लोग हरिया के नाम से पुकारते थे सात वर्ष में ही पिता की शाया उनके ऊपर से उठ गयी १८०५ में महाराजा रणजीत सिंह ने बसंत उत्सव पर प्रतिभा खोज प्रतियोगिता का आयोजन किया जिसमे भाला, तलवार, धनुष-बाण इत्यादि शस्त्र चलाने में नलवा ने अद्भुत प्रदर्शन किया महाराजा बहुत ही प्रभावित होकर अपनी सेना में भारती कर अपने साथ रख लिया एक दिन महाराजा शिकार खेलने गए अचानक रणजीत सिंह के ऊपर शेर ने हमला बोल दिया हरीसिंह ने उसे वही तमाम कर दिया रणजीत सिंह के मुख से अचानक ही नक़ल गया कि तुम तो राजा नल जैसे वीर हो तब से उनके नाम में नलवा जुड़ गया और वे सरदार हरिसिंह नलवा कहलाने लगे, महाराजा के अत्यंत विस्वास पात्र बन गए उनको कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया वहा की स्थित देखकर वे बिहवल हो गए, उनके अन्दर गुरु गोविन्द सिंह का संस्कार और बंदा का रक्त था वे जीते -जागते बंदा बैरागी के सामान गुरु के शिष्य थे वे पहले हिन्दू महापुरुष थे जो वास्तविक बदला लेना जानते थे और ''शठं शाठ्यम समां चरेत'' जैसा ब्यवहार करते थे यदि उनका अनुशरण हमारे हिन्दू वीर करते तो भारत की ये दुर्दसा नहीं होती कश्मीर घाटी में पहुचते ही वे जिन मंदिरों को ढहाकर मस्जिद बनाया गया था उसे वे चाहते थे की उसी स्थान पर मंदिरों का निर्माण किया जाय जिन मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ दिया गया है मुसलमानों से कर लिया जाय उन्होंने जिस प्रकार मुस्लिम शासको ने हिन्दुओ के साथ ब्यवहार किया था उन मुसलमानों के साथ वैसा ही ब्यवहार करते थे उन्होंने बिधर्मी हुए बंधुओ की घर वापसी भी की जिससे बिना किसी संकोच के बड़ी संख्या में लोगो की घर वापसी होने लगी, लेकिन कही न कही हिन्दुओ की सहिशुनता आड़े आयी और कश्मीरी पंडितो ने उन्हें ऐसा करने से रोका मस्जिदों को नहीं गिराया जाय आज उसका परिणाम कश्मीरी पंडित झेल रहे है.
           नलवा कश्मीर को जीतते हुए अफगानिस्तान भी पंहुचा वहा पर हिन्दुओ पर जजिया कर लगा था नलवा ने कर तो हटा ही दिया बदले मुसलमानों से कर वसूलना शुरू किया वे मुस्लिम औरतो की इज्जत तो करते थे लेकिन यदि कोई मुस्लिम हिन्दुओ की औरतो को ले जाता तो वे उसके साथ वैसा ही करते वे सच्चे हिन्दू शासक थे जो हिन्दुओ के दुःख को समझते थे वे मुसलमानों से कैसा ब्यवहार करना जानते थे वे ही एक ऐसे शासक थे जिन्होंने मस्जिदों के बदले मंदिरों की सुरक्षा की, यदि किसी ने मंदिर तोड़े तो उतनी ही मस्जिद तोड़कर उसका जबाब नलवा देता था, अहमद्साह अब्दाली और तैमुरलंग के समय भी बिस्तृत और अखंडित था इसमें कश्मीर, पेशावर, मुल्तान और कंधार भी था, हैरत, कलात, बलूचिस्तान और फारस आदि पर तैमुरलंग का प्रभुत्व था हरीसिंह नलवा ने इनमे से अनेक प्रदेश राजा रणजीत सिंह के राज्य सीमा के विजय अभियान में सामिल कर दिया मुल्तान विजय में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी महाराजा के आवाहन पर आत्मबलिदानी दस्ते में सबसे आगे थे इस संघर्ष में उनके कई साथी बलिदान हुए लेकिन मुल्तान का किला १८२४ में महाराजा रणजीत सिंह के हाथो में आ गया, आज भी अफगानिस्तान की महिलाये नलवा के नाम से अपने बच्चो को डराती है, नलवा एक महान योधा भारतीय सीमा का विस्तार करने वाले गुरु गोविन्द सिंह के असली उत्तराधिकारी थे, उन्हें तो लोग गुरु गोविन्द जैसा ही स्वीकार करते थे, बहुत से बिचारक तो यहाँ तक मानते है कि नलवा के शारीर में सेनानी पुष्यमित्र की आत्मा थी, जिस प्रकार वैदिक धर्म की रक्षा में पुष्यमित्र ने उस काल की दिशा को मोड़ दिया था उसी प्रकार वीर सेनानी हरीसिंह नलवा ने अपने समय में काल को ही अपने हाथ में ले लिया था वह महान देश भक्त, सीमा रक्षक और धर्म रक्षक थे, वे किसी के बिरोधी नहीं थे बल्कि उनके अन्दर हिन्दू स्वाभिमान था, ऐसे हिन्दू हृदय सम्राट वीर सेनापति नलवा को कोटि -कोटि नमन.